मीलों तक छाया सन्नाटा,
बस अँधेरे रौशन हैं यहाँ,
वीरान गलियों से गुजर कर,
न जाने मैं कहाँ आ गया !
खामोश वादियों के बीच,
ख़ामोशी के आलम में,
अपने ही साये से बोलता,
न जाने मैं कहाँ आ गया !
कुछ धूमिल खवाब संजोए,
कुछ धूमिल आशाएँ लेकर,
निकला एक काफिला था,
मेरे कदम थम गये क्यूँ ,
काफिले से बिखर कर,
न जाने मैं कहाँ आ गया !
सदियों से अकेले,
एक मुसाफिर चल रहा है,
एक खोया राहगीर बनकर,
न जाने मैं कहाँ आ गया !
कुछ लम्हें फिसल रहे हैं,
मंजिलें हैं ओझल,
लम्हों को बटोरता,
न जाने मैं कहाँ आ गया !
मेरी मंजिल न जाने कहाँ है,
मेरी चाह न जाने क्या है,
एक कब्रिस्तान की ख़ामोशी में,
न जाने मैं कहाँ आ गया !
Rohit
-Image source:Google Images
बस अँधेरे रौशन हैं यहाँ,
वीरान गलियों से गुजर कर,
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खामोश वादियों के बीच,
ख़ामोशी के आलम में,
अपने ही साये से बोलता,
न जाने मैं कहाँ आ गया !
कुछ धूमिल खवाब संजोए,
कुछ धूमिल आशाएँ लेकर,
अनजाने सपनों को तलाशता,
न जाने मैं कहाँ आ गया !निकला एक काफिला था,
मेरे कदम थम गये क्यूँ ,
काफिले से बिखर कर,
न जाने मैं कहाँ आ गया !
सदियों से अकेले,
एक मुसाफिर चल रहा है,
एक खोया राहगीर बनकर,
न जाने मैं कहाँ आ गया !
कुछ लम्हें फिसल रहे हैं,
मंजिलें हैं ओझल,
लम्हों को बटोरता,
न जाने मैं कहाँ आ गया !
मेरी चाह न जाने क्या है,
एक कब्रिस्तान की ख़ामोशी में,
न जाने मैं कहाँ आ गया !
Rohit
-Image source:Google Images



