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Thursday, January 19, 2012

न जाने मैं कहाँ आ गया

मीलों तक छाया सन्नाटा,
बस अँधेरे रौशन हैं यहाँ,
वीरान गलियों से गुजर कर,

न जाने मैं कहाँ आ गया !

खामोश वादियों के बीच,
ख़ामोशी के आलम में,
अपने ही साये से बोलता,
न जाने मैं कहाँ आ गया !

कुछ धूमिल खवाब संजोए,
कुछ धूमिल आशाएँ लेकर,
अनजाने सपनों को तलाशता,
न जाने मैं कहाँ आ गया !

निकला एक काफिला था,
मेरे कदम थम गये क्यूँ ,
काफिले से बिखर कर,
न जाने मैं कहाँ आ गया !

सदियों से अकेले,
एक मुसाफिर चल रहा है,
एक खोया राहगीर बनकर,
न जाने मैं कहाँ आ गया !

कुछ लम्हें फिसल रहे हैं,
मंजिलें हैं ओझल,
लम्हों को बटोरता,
न जाने मैं कहाँ आ गया !

मेरी मंजिल न जाने कहाँ है,
मेरी चाह न जाने क्या है,
एक कब्रिस्तान की ख़ामोशी में,
न जाने मैं कहाँ आ गया !

Rohit


-Image source:Google Images